अरबों की संपत्ति के मालिक हैं ये नाई, आज भी काटते हैं लोगों के बाल...
बिज़नस : बेंगलुरु में अगर आप ऐसे नाई से बाल कटवाना चाहते हैं जो रोल्स रॉयस जैसी कार से आता हो तो आपको 100 रुपए तक खर्च करने होंगे। रमेश बाबू नाम का यह नाई कोई आम नाई नहीं है। रमेश बाबू करोड़पति हैं और 67 कारों के मालिक हैं, जिनमें रोल्स रॉयस, मर्सिडीज, बीएमडब्लू जैसी महंगी कारें शामिल हैं। इन कारों की कीमत करीब 10 करोड़ रुपए है। रमेश के पास सुजुकी इंट्ररूडर की हाई एंड बाइक भी है, जिसकी कीमत 16 लाख रुपए है। रमेश बाबू जिस रोल्स रॉयस से चलते हैं, उसकी कीमत 3.1 करोड़ रुपए है। पूरे बेंगलुरु में रमेश बाबू के अलावा कुछ ही लोग हैं, जिनके पास रोल्स रॉयस जैसी कार है। वो भी कभी मामूली नाई हुआ करते थे, लेकिन अपनी दूरदृष्टि, मेहनत और लगन से आज अरबों के मालिक हैं।
कौन हैं रमेश बाबू ?
रमेश बाबू की उम्र 43 साल है। बेंगलुरु के अनंतपुर के रहने वाले रमेश जब 7 साल के थे, तभी उनके पिता गुजर गए। पिता की मौत के बाद रमेश बाबू की मां ने लोगों के घरों में खाना पकाने का काम किया, ताकि बच्चों का पेट भर सकें। रमेश के पिता की दुकान को महज 5 रुपए महीना पर किराए पर उनके चाचा ने ले लिया था। रमेश के पिता बेंगलुरु के चेन्नास्वामी स्टेडियम के पास अपनी नाई की दुकान चलाते थे। उन दिनों में पांच रुपए बहुत ही मामूली रकम थी। पांच रुपए में घर चलना बहुत ही मुश्किल-भरा काम था।
रमेश बाबू की उम्र 43 साल है। बेंगलुरु के अनंतपुर के रहने वाले रमेश जब 7 साल के थे, तभी उनके पिता गुजर गए। पिता की मौत के बाद रमेश बाबू की मां ने लोगों के घरों में खाना पकाने का काम किया, ताकि बच्चों का पेट भर सकें। रमेश के पिता की दुकान को महज 5 रुपए महीना पर किराए पर उनके चाचा ने ले लिया था। रमेश के पिता बेंगलुरु के चेन्नास्वामी स्टेडियम के पास अपनी नाई की दुकान चलाते थे। उन दिनों में पांच रुपए बहुत ही मामूली रकम थी। पांच रुपए में घर चलना बहुत ही मुश्किल-भरा काम था।
अखबार और दूध की बोतलें बेचकर किया गुजारा ....
उनकी रूरतें पांच रुपए में पूरी हो ही नहीं सकती थीं। वे तीन भाई-बहन थे। तीनों ने मजबूरी में दिन में बस एक की बार भोजन करना शुरू किया। दूसरों के घर में नौकरी करने लगी मां की मदद करने के मकसद से रमेश ने भी छोटे-मोटे काम करने शुरू किए। मिडिल स्कूल की पढ़ाई करते हुए ही उन्होंनेे अखबार और दूध की बोतलें बेचना शुरू किया। उन मुश्किल-भरे दिनों में किसी तरह उनके पूरे परिवार ने मिलकर एक दूसरे की मदद करते हुए अपने दर्द भरे दिन गुजारे। जीवन की इसी उठा-पठक की बीच उन्होंने अपनी दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई की। 12वीं क्लास में वे असफल हो गए।
उनकी रूरतें पांच रुपए में पूरी हो ही नहीं सकती थीं। वे तीन भाई-बहन थे। तीनों ने मजबूरी में दिन में बस एक की बार भोजन करना शुरू किया। दूसरों के घर में नौकरी करने लगी मां की मदद करने के मकसद से रमेश ने भी छोटे-मोटे काम करने शुरू किए। मिडिल स्कूल की पढ़ाई करते हुए ही उन्होंनेे अखबार और दूध की बोतलें बेचना शुरू किया। उन मुश्किल-भरे दिनों में किसी तरह उनके पूरे परिवार ने मिलकर एक दूसरे की मदद करते हुए अपने दर्द भरे दिन गुजारे। जीवन की इसी उठा-पठक की बीच उन्होंने अपनी दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई की। 12वीं क्लास में वे असफल हो गए।
शुरू की टूर एंड ट्रेवल्स कंपनी ....
12वीं क्लास में असफल होने के बाद उन्होंने इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से रमेश बाबू तमाम कठिनाइयों केबावजूद पढ़ाई करते थे। 12वीं क्लास में असफल होने के बाद उन्होंने इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से इलेक्ट्रॉनिक्स में डिप्लोमा किया। 1989 में उन्होंने पिता की दुकान वापस लेकर उसे नए सिरे से चलाया। इस दुकान को मॉडर्न बनाकर उन्होंने खूब पैसे कमाए और एक मारुति वैन खरीद ली। चूंकि वह कार खुद नहीं चला पाते थे, इसलिए उन्होंने कार को किराए पर देना शुरू कर दिया। 2004 में उन्होंने अपनी कंपनी रमेश टूर एंड ट्रेवल्स की शुरुआत की।
12वीं क्लास में असफल होने के बाद उन्होंने इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से रमेश बाबू तमाम कठिनाइयों केबावजूद पढ़ाई करते थे। 12वीं क्लास में असफल होने के बाद उन्होंने इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से इलेक्ट्रॉनिक्स में डिप्लोमा किया। 1989 में उन्होंने पिता की दुकान वापस लेकर उसे नए सिरे से चलाया। इस दुकान को मॉडर्न बनाकर उन्होंने खूब पैसे कमाए और एक मारुति वैन खरीद ली। चूंकि वह कार खुद नहीं चला पाते थे, इसलिए उन्होंने कार को किराए पर देना शुरू कर दिया। 2004 में उन्होंने अपनी कंपनी रमेश टूर एंड ट्रेवल्स की शुरुआत की।
रमेश बाबू के पास है 256 कारों का काफिला .....
आज रमेश बाबू के पास 256 कारों का काफिला है। और 60 से भी ज्यादा ड्राइवर हैं। 9 मर्सडीज, 6 बीएमडब्ल्यू, एक जगुआर, तीन ऑडी कारें भी है और रॉल्स रॉयस जैसी महंगी कारें चलाकर लोगो से एक दिन का किराया 50,000 रुपए तक वसूलते है। इन सब काम के बाद आज भी उन्होंने अपना पुश्तैनी काम नहीं छोड़ा। वह आज भी अपने पिता के सैलून इनर स्पेस को चला रहे हैं, जिसमें वो हर दिन 2 घंटे ग्राहकों के बाल काटते हैं।
आज रमेश बाबू के पास 256 कारों का काफिला है। और 60 से भी ज्यादा ड्राइवर हैं। 9 मर्सडीज, 6 बीएमडब्ल्यू, एक जगुआर, तीन ऑडी कारें भी है और रॉल्स रॉयस जैसी महंगी कारें चलाकर लोगो से एक दिन का किराया 50,000 रुपए तक वसूलते है। इन सब काम के बाद आज भी उन्होंने अपना पुश्तैनी काम नहीं छोड़ा। वह आज भी अपने पिता के सैलून इनर स्पेस को चला रहे हैं, जिसमें वो हर दिन 2 घंटे ग्राहकों के बाल काटते हैं।
अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरुख खान तक हैं इनके क्लाइंट ....
लग्जरी टैक्सी सर्विस शुरू करने के बाद से रमेश बाबू के क्लाइंट की लिस्ट बढ़ती गई। और अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन से लेकर शाहरुख खान जैसी बॉलीवुड सेलेब्रिटी उनकी क्लाइंट लिस्ट में शामिल होती गई। रमेश बाबू रोज सुबह साढ़े 5 बजे अपने गैराज में जाते हैं। गाडिय़ों की देखरेख, बुकिंग की जानकारी लेकर साढ़े 10 बजे अपने ऑफिस पहुंचते हैं। पूरे दिन बिजनेस में बिजी रहने के बाद शाम को 5-6 बजे के बीच अपने सैलून जाते हैं। रमेश बाबू के मुताबिक, उनके ज्यादातर क्लाइंट्स बाल कटाने कोलकाता और मुंबई से आते हैं।
लग्जरी टैक्सी सर्विस शुरू करने के बाद से रमेश बाबू के क्लाइंट की लिस्ट बढ़ती गई। और अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन से लेकर शाहरुख खान जैसी बॉलीवुड सेलेब्रिटी उनकी क्लाइंट लिस्ट में शामिल होती गई। रमेश बाबू रोज सुबह साढ़े 5 बजे अपने गैराज में जाते हैं। गाडिय़ों की देखरेख, बुकिंग की जानकारी लेकर साढ़े 10 बजे अपने ऑफिस पहुंचते हैं। पूरे दिन बिजनेस में बिजी रहने के बाद शाम को 5-6 बजे के बीच अपने सैलून जाते हैं। रमेश बाबू के मुताबिक, उनके ज्यादातर क्लाइंट्स बाल कटाने कोलकाता और मुंबई से आते हैं।
रमेश बाबू ने जोखिम भी उठाए ....
जब रमेश बाबू ने 2004 में पहली बार लक्जरी कार खरीदी, तब सभी ने कहा कि वे बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। 2004 में चालीस लाख खर्च करना बहुत बड़ी बात थी। रमेश बताते हैं कि मेरे मन में भी कुछ संदेह थे ,दुविधा भी थी। लेकिन, कारोबार को बढ़ाने के लिए जोखिम तो उठाना था, सो उठा लिया। साथ ही ये भी सोच लिया था कि अगर मामला बिगड़ गया तो लक्जरी कार बेच दूंगा। लेकिन, बेचने की नौबत नहीं आई। किसी और कारोबारी के पास नई लक्जरी कार नहीं थी, ये मेरे लिए फायदेमंद साबित हुआ। कुछ लोगों के पास सेकंड हैंड कारें थीं, लेकिन लोगों की पसंद मेरी नई लक्जरी कार बन गई। आपको बता दें कि 2004 में बेंगलुरु में वे ही ऐसे पहले शख्स थे जो लक्जरी कार किराए पर देते थे।
जब रमेश बाबू ने 2004 में पहली बार लक्जरी कार खरीदी, तब सभी ने कहा कि वे बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। 2004 में चालीस लाख खर्च करना बहुत बड़ी बात थी। रमेश बताते हैं कि मेरे मन में भी कुछ संदेह थे ,दुविधा भी थी। लेकिन, कारोबार को बढ़ाने के लिए जोखिम तो उठाना था, सो उठा लिया। साथ ही ये भी सोच लिया था कि अगर मामला बिगड़ गया तो लक्जरी कार बेच दूंगा। लेकिन, बेचने की नौबत नहीं आई। किसी और कारोबारी के पास नई लक्जरी कार नहीं थी, ये मेरे लिए फायदेमंद साबित हुआ। कुछ लोगों के पास सेकंड हैंड कारें थीं, लेकिन लोगों की पसंद मेरी नई लक्जरी कार बन गई। आपको बता दें कि 2004 में बेंगलुरु में वे ही ऐसे पहले शख्स थे जो लक्जरी कार किराए पर देते थे।
रमेश बाबू अपनी दोनों बेटियों और एक बेटे को बतौर टीचर कटिंग के टिप्स देते हैं। रमेश बाबू का कहना है कि यह एक तरह की जॉब है, जिसमें प्रोफेशनल होना जरूरी है। वो उन्हें अपने साथ सैलून भी ले जाते हैं, लेकिन अभी छोटी उम्र होने के कारण उन्हें वहां काम नहीं करने देते। साथ ही अब रमेश बाबू अपने सैलून और टैक्सी सर्विस को विजयवाड़ा में शुरू करने की प्लानिंग कर रहे हैं। उनका मानना है कि हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में बिजनेस की सफलता के लिए काफी वक्त लगता है, लेकिन छोटे शहरों में आपके पास कई विकल्प होते हैं।

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